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बाढ़ नियंत्रण तथा नदी आकारिकी

बाढ़ तबाही उत्‍पन्‍न करती है और वर्ष दर वर्ष जीवन एवं सम्‍पत्ति की बरबादी का कारण बनती है । नदी प्रबंधन पहलुओं को नदी के साथ शहरीकरण बढ़ने, बाढ़ मैदानों के अतिक्रमण और मानव हस्‍तक्षेप द्वारा विकसित गतिविधियों के कारण नए आयाम अर्जित हुए हैं । भूआकारिकी पहलुओं, नुकसान आवर्ती आकलन, जोखिम निर्धारण, मूल्‍यांकन बीमा द्वारा जोखिम पूर्ति इत्‍यादि साथ में बाढ़ पूर्वानुमान और विपदा प्रबंध पर महत्‍व को कवर करते हुए नदी बेसिन को एक ही मानने पर जोर दिया जाता है ।

नदियां उसके निकटवर्ती तटों की भूमि और सम्‍पत्ति को बहुधा नुकसान पहुंचाती है । जलोद मैदान में नदियां भी अपने रास्‍ते को बहुधा बदलती रहती हैं । बाढ़ों से सुरक्षित मार्ग, पुलों, तटबंधों इत्‍यादि को चारों और से संरक्षण उपलब्‍ध करवाने के लिए संरेखण के साथ साथ नदी चैनलों को स्थिर रखने की आवश्‍यकता है।

शहरी क्षेत्रों में जनसंख्‍या के अंतरागम के कारण और जिसके परिणामस्‍वरूप भूमि संसाधनों पर दबाव पड़ता है, भूमि को नदी के रूट के साथ आवरित किया जाना चाहिए ताकि भूमि उद्धार और प्रयोग किया जा सके । ऐसे निवासों को सुरक्षा के लिए बाढ संरक्षण कार्य उपलब्‍ध करवाए जाने चाहिए । वाप्‍कोस बाढ़ों के न्‍यूनीकरण में विशेषज्ञ परामर्शी सेवाएं उपलब्‍ध कराती है ।

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पिछला अद्यतन - 15-04-2026
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